पैदल शिक्षा की कठिन राह: बनलेख, मौराडी और सल्ली सायली के छात्रों का संघर्ष
पैदल शिक्षा की कठिन राह: बनलेख, मौराडी और सल्ली सायली के छात्रों की संघर्ष गाथा
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में शिक्षा प्राप्त करना आज भी एक चुनौतीपूर्ण कार्य बना हुआ है। चंपावत जनपद के दूरस्थ गांव—बनलेख, मौराडी और सल्ली सायली—के छात्र-छात्राएं इस कठिन सच्चाई को हर दिन जीते हैं। इन गांवों के बच्चे राजकीय इंटर कॉलेज धौंन में पढ़ने के लिए लगभग 15 किलोमीटर तक का सफर रोज़ पैदल तय करते हैं।
सुबह की ठंडी हवाओं और पहाड़ी रास्तों के बीच ये छात्र अपने कंधों पर भारी बस्ते लेकर निकल पड़ते हैं। उबड़-खाबड़ रास्ते, घने जंगल, और कभी-कभी जंगली जानवरों का खतरा—इन सभी चुनौतियों के बावजूद उनकी शिक्षा के प्रति लगन कम नहीं होती। कई बार बारिश, बर्फबारी और तेज धूप भी इनके हौसले को डिगा नहीं पाती।
इस लंबी दूरी के कारण छात्रों को समय पर विद्यालय पहुंचने में कठिनाई होती है, जिससे उनकी पढ़ाई पर भी असर पड़ता है। थकान के चलते वे कक्षा में पूरी तरह ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते। इसके अलावा, इतनी लंबी दूरी पैदल चलना उनके स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में परिवहन सुविधाओं का अभाव इस समस्या का मुख्य कारण है। यदि इन गांवों के लिए नियमित बस सेवा या स्कूल वाहन की व्यवस्था की जाए, तो छात्रों को काफी राहत मिल सकती है। साथ ही, सरकार को ऐसे क्षेत्रों में नए विद्यालय खोलने या आवासीय विद्यालय की सुविधा प्रदान करने पर भी विचार करना चाहिए।
शिक्षा हर बच्चे का अधिकार है, और इसके लिए बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है। बनलेख, मौराडी और सल्ली सायली के इन छात्रों का संघर्ष हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम उन्हें बेहतर भविष्य देने के लिए पर्याप्त प्रयास कर रहे हैं?
इन बच्चों की लगन और मेहनत सराहनीय है, लेकिन अब समय आ गया है कि उनके इस संघर्ष को कम करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।

